Lets Explore,
Cover of Vyakaran Siddhanta Kaumudi (Set of 4 Volumes)

Vyakaran Siddhanta Kaumudi (Set of 4 Volumes)

(Paperback)

Pt. Harekant Mishra,

Chaukhambha Orientalia (Publisher)

Published
01-01-17
Reviews
0

Ships within 2-4 days

Out Of Stock

240.00
247.00
3% off

वैदिक काल में कागज तो था ही नहीं, लिखने की सामग्री का विकास नहीं हुआ था। इसी कारण वेदों को कण्ठस्थ रखना पड़ता था। कण्ठस्थीकरण प्रक्रिया में लोगों के उच्चारण में भिन्नता आने लगी। स्वरों की विभिन्नता को दूर करने के लिए कुछ नियमों का निर्माण किया जाने लगा। ब्राह्मण ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर व्याकरण की परिभाषिकशब्दावली के दर्शन होते हैं। शतपथ ब्राह्मण में एकवचन तथा बहुवचन तथा छान्दोग्य उपनिषद् में स्वर, उष्म, स्पर्श वर्ण विभाजक संज्ञाओं का उल्लेख हुआ है। सामवेदसंहिता में महर्षिगण मन्त्रों में व्याकरण निर्दिष्ट पदों का उल्लेख करके आराध्य देवों की स्तुति करते थे। वेदों में स्थित स्वरों के उच्चारण के कारण ही व्याकरण का उद्भव हुआ। अतः सर्वप्रथम वैदिक व्याकरण के लिए प्रतिशाख्य की रचना हुई। प्रातिशाख्यों में वेद की विभिन्न शाखाओं से सम्बद्ध व्याकरण के नियम दिये गये हैं। इसमें वर्णोच्चारण शिक्षा, संहिता के पदपाठ में परिवर्तन, सन्धि विज्ञान, स्वरविधान, पदों का विभाजन, तथा स्वरसंचार आदि विषयों का विवेचन किया गया है। इस प्रकार व्याकरण का प्रथम श्रोत वेदों से उपलब्ध होता है। व्याकरण को वेदाङ्ग कहा गया है। वेदों के छः अङ्ग है- शिक्षा, कल्प, छन्द, निरुक्त, व्याकरण तथा ज्योतिष। इन सर्वो अङ्गों में व्याकरण का प्रमुख स्थान है, जैसाकि कहा गया है

Vidya AI