वो तेरा घर, ये मेरा घर इस बंगले के गृह-पà¥à¤°à¤µà¥‡à¤¶ पर मां-पिताजी दोनो आठथे । बंगले की à¤à¤µà¥à¤¯à¤¤à¤¾ देखकर खà¥à¤¶ à¤à¥€ बहà¥à¤¤ हà¥à¤ थे, पर माठने उसांस à¤à¤°à¤•र कहा था, 'सोचा था, कà¤à¥€-कà¤à¤¾à¤° छà¥à¤Ÿà¥à¤Ÿà¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ में तà¥à¤® लोग आकर रहोगे, पर अब यह महल छोड़कर तà¥à¤® उस कà¥à¤Ÿà¤¿à¤¯à¤¾ में तो आने से रहे।' उनà¥à¤¹à¥‹à¤¨à¥‡ कहा था, 'हम यहाठà¤à¥€ कहाठरह पाते है मां । नौकरी के चकà¥à¤•र में रोज तो यहाठसे वहाठà¤à¤¾à¤—ते रहते हैं। यहाठतो शायद पेंशन के बाद ही रह पाà¤à¤‚गे । मैं तो कहता हूठआप लोग वह घर बेच दो । पैसे फिकà¥à¤¸ डिपॉजिट में रख दो या लड़कियों को दे दो और ठाठसे यहाठआकर रहो ।' 'न बेटे! मेरे जीते-जी तो वह मकान नहीं बिकेगा,' पिताजी ने दृà¥à¤¤à¤¾ के साथ कहा था, 'हमने बड़े अरमानों से यह घर बनाया था । इसे लेकर बहà¥à¤¤ सपने संजोठथे । अब वे सारे सपने हवा हो गà¤, यह बात और है।' [इसी संगà¥à¤°à¤¹ की कहानी 'साà¤à¤ की बेला, पंछी अकेला' से]