ह किताब साहितà¥à¤¯à¤¿à¤• कृतियों के सिनेमाई रूपांतरण के सैदà¥à¤§à¤¾à¤‚तिक पकà¥à¤·à¥‹à¤‚ पर पà¥à¤°à¤•ाश डालती है, साथ ही सिनेमा के उन सब पहलà¥à¤“ं का à¤à¥€ सोदाहरण परिचय देती है जिनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ फ़िलà¥à¤® को समà¤à¤¨à¥‡ के लिठजानना ज़रूरी है। लेखक ने हिंदी और अनà¥à¤¯ à¤à¤¾à¤·à¤¾à¤“ं की कई साहितà¥à¤¯à¤¿à¤• कृतियों और उन पर बनी फ़िलà¥à¤®à¥‹à¤‚ का तà¥à¤²à¤¨à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤• अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ करते हà¥à¤ रूपांतरण पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ की चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ पर विचार किया है। पà¥à¤¸à¥à¤¤à¤• में à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ फ़िलà¥à¤®à¥‹à¤‚ के तकनीकी विकास की à¤à¥€ à¤à¤• à¤à¤²à¤• है। लेखक ने बताया है कि किस तरह कैमरे की गà¥à¤£à¤µà¤¤à¥à¤¤à¤¾, साउंड रिकॉरà¥à¤¡à¤¿à¤‚ग और à¤à¤¡à¤¿à¤Ÿà¤¿à¤‚ग के साथ-साथ संवाद अदायगी और गीतों की पà¥à¤°à¤¸à¥à¤¤à¥à¤¤à¤¿ में बदलाव आया। इसमें अनेक कà¥à¤²à¤¾à¤¸à¤¿à¤• फ़िलà¥à¤®à¥‹à¤‚ की निरà¥à¤®à¤¾à¤£ पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ और उससे जà¥à¤¡à¤¼à¥‡ रोचक पà¥à¤°à¤¸à¤‚ग हैं। पिछले à¤à¤•-दो दशकों में पà¥à¤°à¤¦à¤°à¥à¤¶à¤¿à¤¤ कई हिंदी फ़िलà¥à¤®à¥‹à¤‚ के ज़रिठफ़िलà¥à¤® उदà¥à¤¯à¥‹à¤— के चरितà¥à¤° की पड़ताल करने की à¤à¥€ कोशिश की गई है। बिमल रॉय, सतà¥à¤¯à¤œà¤¿à¤¤ राय और मणि कौल जैसे दिगà¥à¤—ज निरà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¤•ों की विशिषà¥à¤Ÿà¤¤à¤¾à¤“ं पर रोशनी डाली गई है और पà¥à¤°à¥‡à¤®à¤šà¤‚द के संकà¥à¤·à¤¿à¤ªà¥à¤¤ फ़िलà¥à¤®à¥€ सफ़र की à¤à¥€ चरà¥à¤šà¤¾ है।