इस संगà¥à¤°à¤¹ की कविताà¤à¤‚ लोकतंतà¥à¤° और लोकतंतà¥à¤° में सबकी à¤à¤¾à¤—ीदारी से जà¥à¤¡à¤¼à¥‡ संदरà¥à¤à¥‹à¤‚ व सवालों को सामने रखती हैं। आज का समय तेज विकास है मगर आबादी का à¤à¤• बड़ा हिसà¥à¤¸à¤¾ विकास की कीमत à¤à¥€ चà¥à¤•ाने को विवश है। समता और सामाजिक नà¥à¤¯à¤¾à¤¯ का मà¥à¤¦à¥à¤¦à¤¾ आज à¤à¥€ उतना ही पà¥à¤°à¤¾à¤¸à¤‚गिक बना हà¥à¤† है। अपने समय से संवाद करतीं ये कविताà¤à¤‚ अपनी पà¥à¤°à¤¾à¤¸à¤‚गिकता को साबित करती हैं और समय को बहसतलब बनाती हैं।