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Cover of Prem ke Paath (प्रेम के पाठ)

Prem ke Paath (प्रेम के पाठ)

(Paperback)

Ramesh Upadhyay (रमेश उपाध्याय),

ANUUGYA BOOKS (Publisher)

Published
01-Jan-2020
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आजकल लख ज रह परम कहनय म वह परम कह ह, ज हम अपन परवर क लग स, सग-सबधय स, पडसय स, मतर स, सहकरमय स, दशवसय स और मनषय हन क नत दनय भर क मनषय स करत ह? उनम वह परम भ कह ह, ज हम मनवतर परणय स, परकतक तथ मनव-नरमत सदर वसतओ स, सहतयक और कलतमक कतय स, मनव-जवन क बहतर बनन क लए कय जन वल करय स तथ उन करय क करन वल लग स करत ह? उनम त वह परम भ नजर नह आत, ज हम सवय स, अपन जवन स और एक मनवय जवन जन क लए कय जन वल अपन करय स करत ह, जनम परम करन, ववह करन, परवर चलन, बचच पद करन और उनह अचछ तरह पल-पस तथ पढ-लखकर अचछ इसन बनन जस बहत-स करय शमल ह। आजकल क बहत-स परम कहनय म परम क कवल ‘‘द वयकतय क नज ममल’’ और वह भ कवल यन सबध तक समत ममल बन दय जत ह, मन उन वयकतय क अपन जवन क आरथक, समजक, ससकतक, रजनतक यथरथ स कई लन-दन न ह और व ऐतहसक रप स वकसत मनवय वयकततव न हकर कवल आहर, नदर, भय और मथन म लपत पश ह! परम कहन कवल परम क कहन नह हत। वह सपरण जवन और जगत क कहन हत ह। वह जवन और जगत क परममय बनकर बहतर और सदर बनन क उददशय स लख जन वल कहन हत ह। अत समज क वरतमन वयवसथ क आलचन तथ उसक जगह कस बहतर समज वयवसथ क मग परम कहन अनवरयत करत ह। – रमश उपधयय

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