आजकल लख ज रह परम कहनय म वह परम कह ह, ज हम अपन परवर क लग स, सग-सबधय स, पडसय स, मतर स, सहकरमय स, दशवसय स और मनषय हन क नत दनय à¤à¤° क मनषय स करत ह? उनम वह परम ठकह ह, ज हम मनवतर परणय स, परकतक तथ मनव-नरमत सदर वसतओ स, सहतयक और कलतमक कतय स, मनव-जवन क बहतर बनन क लठकय जन वल करय स तथ उन करय क करन वल लग स करत ह? उनम त वह परम ठनजर नह आत, ज हम सवय स, अपन जवन स और à¤à¤• मनवय जवन जन क लठकय जन वल अपन करय स करत ह, जनम परम करन, ववह करन, परवर चलन, बचच पद करन और उनह अचछ तरह पल-पस तथ पढ-लखकर अचछ इसन बनन जस बहत-स करय शमल ह। आजकल क बहत-स परम कहनय म परम क कवल ‘‘द वयकतय क नज ममल’’ और वह ठकवल यन सबध तक समत ममल बन दय जत ह, मन उन वयकतय क अपन जवन क आरथक, समजक, ससकतक, रजनतक यथरथ स कई लन-दन न ह और व à¤à¤¤à¤¹à¤¸à¤• रप स वकसत मनवय वयकततव न हकर कवल आहर, नदर, à¤à¤¯ और मथन म लपत पश ह! परम कहन कवल परम क कहन नह हत। वह सपरण जवन और जगत क कहन हत ह। वह जवन और जगत क परममय बनकर बहतर और सदर बनन क उददशय स लख जन वल कहन हत ह। अत समज क वरतमन वयवसथ क आलचन तथ उसक जगह कस बहतर समज वयवसथ क मग परम कहन अनवरयत करत ह। – रमश उपधयय