
Ek Dalit Ki Aatmkatha
(Paperback)
Ram Rakshadas,
Prabhat Prakashan (Publisher)
Ships within 2-4 days
Out Of Stock

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15 जुलाई, 1962 को मैं किसी तरह बी.ए. पास कर गया। उस समय पूरा परिवार कर्ज में डूबा हुआ था, घर-गृहस्थी चलाने और पटना में रहकर पढ़ाई करने, पुस्तकें खरीदने के लिए रुपयों की जरूरत थी। आमदनी के नाम पर कॉलेज से मिलनेवाली छात्रवृत्ति एकमात्र साधन था। इससे मेरे और परिवार के खर्च की पूर्ति नहीं हो पाती थी, इसलिए मजबूरी में कर्ज लेना पड़ता था। थोड़ी-बहुत खेती थी, जिससे कुछ महीने का खर्च निकल जाता था। इतना ही नहीं, 5 अप्रैल, 1961 को हमारे एक लड़का भी हो गया, जिसकी परवरिश और दवा-दारू का खर्च बढ़ गया। ऐसी विकट परिस्थिति में मेरे शुभचिंतकों ने राय दी कि मुझे तुरंत नौकरी कर लेनी चाहिए; हमारी स्थिति आगे पढ़ने की नहीं है । सामने पुस्तकें खुली रहती थीं और आँखों के सामने पत्नी का मलिन चेहरा मानसपटल पर कौंध जाता था। पत्नी चाहकर भी मेरी पढ़ाई में बाधक बनना नहीं चाहती थी। मेरे मन में तूफान मचा हुआ था। एक तरफ घर की माली हालत को दुरुस्त करना और दूसरी ओर अपने अरमानों तथा लक्ष्यों को प्राप्त करना, दोनों जरूरी कार्य थे। दोनों की राहें जुदा थीं। एक को छोड़ना ही पड़ेगा।
इसी पुस्तक से-
संघर्षों, कष्टों और अभावों से जूझकर अपनी अदम्य इच्छाशक्ति तथा जिजीविसाह के बल पर पढ़ाई पूरी कर जीवन में सफलता प्राप्त करने की प्रेरणाप्रद आत्मकथा।
