विपशà¥à¤¯à¤¨à¤¾ में पà¥à¤°à¥‡à¤®" मानवीय अनà¥à¤à¥‚तियों के कà¥à¤¶à¤² चितेरे शà¥à¤°à¥€ दयानंद पांडेय जी का à¤à¤• अदà¥à¤à¥à¤¤ और दिवà¥à¤¯ उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ है। अदà¥à¤à¥à¤¤ इसलिठकि इसमें अपà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤¾à¤¶à¤¿à¤¤ ढंग से मानव मन में घटित होने वाली à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾à¤“ं को शबà¥à¤¦à¤¾à¤µà¤¿à¤¤ कर दिया गया है और दिवà¥à¤¯ इसलिठकि इसमें सतà¥à¤¯ की पवितà¥à¤° आंच है। ये वे अनà¥à¤à¥‚तियां हैं जो न केवल नैसरà¥à¤—िक हैं बलà¥à¤•ि इनका अपना à¤à¤• सच à¤à¥€ है। जब मैंने इस उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ की पूरà¥à¤µà¤ªà¥€à¤ िका या इसकी रचना पà¥à¤°à¤•à¥à¤°à¤¿à¤¯à¤¾ के बारे में पढ़ा और बाद में इस पूरे उपनà¥à¤¯à¤¾à¤¸ को पढ़ा तो बहà¥à¤¤ कà¥à¤› समठमें आया कि आज लेखक न जाने कितनी तरह की समसà¥à¤¯à¤¾à¤“ं पर बात करते हैं न जाने कितनी तरह की सà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ को चितà¥à¤°à¤¿à¤¤ करते हैं और न जाने कितनी तरह की पेचीदा उलà¤à¤¨à¥‹à¤‚ को सà¥à¤²à¤à¤¾à¤¨à¥‡ का à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करते हैं मगर इन सà¤à¥€ में à¤à¤• बात अकà¥à¤¸à¤° छोड़ जाते हैं और वह है कोमल संवेदनाओं के साथ घटित होने वाले "हादसे" विशेषकर खी मन की चोट खाती हà¥à¤ˆ संवेदनाà¤à¤‚। जी हां! मैं हादसे शबà¥à¤¦ का पà¥à¤°à¤¯à¥‹à¤— कर रही हूं कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ मन की संवेदनाà¤à¤‚ हमेशा से ही अपà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¤¾à¤¶à¤¿à¤¤ ढंग से या तो दबा दी जाती हैं या नैतिकता के रैपर में लपेट दी जाती हैं।