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Cover of Alaukik Pream Me Doobee Vipashyana Me Pream अलौकिक प्रेम में डूबी विपश्यना में प्रेम (समीक्षाएं )

Alaukik Pream Me Doobee Vipashyana Me Pream अलौकिक प्रेम में डूबी विपश्यना में प्रेम (समीक्षाएं )

(Paperback)

Dr Surbhi Singh,

Advik Publication Pvt. Ltd. (Publisher)

Published
2025-02-20
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विपश्यना में प्रेम" मानवीय अनुभूतियों के कुशल चितेरे श्री दयानंद पांडेय जी का एक अद्भुत और दिव्य उपन्यास है। अद्भुत इसलिए कि इसमें अप्रत्याशित ढंग से मानव मन में घटित होने वाली भावनाओं को शब्दावित कर दिया गया है और दिव्य इसलिए कि इसमें सत्य की पवित्र आंच है। ये वे अनुभूतियां हैं जो न केवल नैसर्गिक हैं बल्कि इनका अपना एक सच भी है। जब मैंने इस उपन्यास की पूर्वपीठिका या इसकी रचना प्रक्रिया के बारे में पढ़ा और बाद में इस पूरे उपन्यास को पढ़ा तो बहुत कुछ समझ में आया कि आज लेखक न जाने कितनी तरह की समस्याओं पर बात करते हैं न जाने कितनी तरह की स्थितियों को चित्रित करते हैं और न जाने कितनी तरह की पेचीदा उलझनों को सुलझाने का भी प्रयास करते हैं मगर इन सभी में एक बात अक्सर छोड़ जाते हैं और वह है कोमल संवेदनाओं के साथ घटित होने वाले "हादसे" विशेषकर खी मन की चोट खाती हुई संवेदनाएं। जी हां! मैं हादसे शब्द का प्रयोग कर रही हूं क्योंकि स्त्री मन की संवेदनाएं हमेशा से ही अप्रत्याशित ढंग से या तो दबा दी जाती हैं या नैतिकता के रैपर में लपेट दी जाती हैं।

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