आचारà¥à¤¯ चतà¥à¤°à¤¸à¥‡à¤¨ शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ का जनà¥à¤® 26 अगसà¥à¤¤ 1891 को à¤à¤¾à¤°à¤¤ में उतà¥à¤¤à¤° पà¥à¤°à¤¦à¥‡à¤¶ राजà¥à¤¯ के बà¥à¤²à¤‚दशहर जिले के à¤à¤• छोटे से गाà¤à¤µ औरंगाबाद चंडोक (अनूपशहर के पास) में हà¥à¤† था। उनके पिता पंडित केवाल राम ठाकà¥à¤° थे और माता ननà¥à¤¹à¥€à¤‚ देवी थीं। उनका जनà¥à¤® नाम चतà¥à¤°à¥à¤à¥à¤œ था। चतà¥à¤°à¥à¤à¥à¤œ ने अपनी पà¥à¤°à¤¾à¤¥à¤®à¤¿à¤• शिकà¥à¤·à¤¾ सिकंदà¥à¤°à¤¾à¤¬à¤¾à¤¦ के à¤à¤• सà¥à¤•ूल में समापà¥à¤¤ की। फिर उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने राजसà¥à¤¥à¤¾à¤¨ के जयपà¥à¤° के संसà¥à¤•ृत कॉलेज में दाखिला लिया। यहाठसे उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦ और शासà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ में आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦ की उपाधि संसà¥à¤•ृत में वरà¥à¤· 1915 में पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ की। उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦ विदà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¥€à¤ से आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¤¾à¤šà¤¾à¤°à¥à¤¯ की उपाधि à¤à¥€ पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ की। अपनी शिकà¥à¤·à¤¾ समापà¥à¤¤ करने के बाद वह आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¤¿à¤• चिकितà¥à¤¸à¤• के रूप में अपना अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ शà¥à¤°à¥‚ करने के लिठदिलà¥à¤²à¥€ आ गà¤à¥¤ उनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने दिलà¥à¤²à¥€ में अपनी खà¥à¤¦ की आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦à¤¿à¤• डिसà¥à¤ªà¥‡à¤‚सरी खोली, लेकिन यह अचà¥à¤›à¥€ तरह से नहीं चला और उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ इसे बंद करना पड़ा। वह पà¥à¤°à¤¤à¤¿ माह 25 रà¥à¤ªà¤¯à¥‡ के वेतन पर à¤à¤• अमीर आदमी के धरà¥à¤®à¤¾à¤°à¥à¤¥ औषधालय में शामिल हो गया। बाद में 1917 में, वे डीà¤à¤µà¥€ कॉलेज, लाहौर (अब पाकिसà¥à¤¤à¤¾à¤¨ में) में आयà¥à¤°à¥à¤µà¥‡à¤¦ के वरिषà¥à¤ पà¥à¤°à¥‹à¤«à¥‡à¤¸à¤° के रूप में शामिल हà¥à¤à¥¤